धान खरीदी की आड़ में ज़हर बोता तथाकथित यूट्यूब चैनल के स्टेट हेड बोधन भट्ट और भाजपा प्राधिकृत अधिकारी दुर्जन साहू

स्क्रिप्ट :- छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में पंजीयन क्रमांक 2022 वाली सरकारी सेवा सहकारी समिति जूंजेरा (पाररास) आज धान खरीदी से अधिक विवाद, आक्रोश और सामाजिक विघटन का केंद्र बनती जा रही है। मीडिया कर्मी और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि समिति कार्यालय में तथाकथित यूट्यूब चैनल के स्टेट हेड बोधन भट्ट के साथ मिलकर दुर्जन साहू द्वारा शब्दों की मर्यादा तोड़ रहे है, और कथित रूप से एक विशेष समुदाय को चर्चा का विषय बनाकर उकसाने वाली भाषा का प्रयोग किया जा रहा है। यदि ये आरोप सही हैं, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक शांति के लिए गंभीर खतरा है।स्थानीय जनचर्चाओं और ग्रामीणों के बीच उठ रहे सवाल इस ओर इशारा कर रहे हैं कि जिस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों को राहत देना था, वही व्यवस्था अब सत्ता के संरक्षण में कथित रूप से मनमानी, अपमान और समाज को बांटने का माध्यम बनती जा रही है।बताया जा रहा है कि समिति में प्राधिकृत अधिकारी के रूप में कार्यरत दुर्जन साहू के कार्यकाल में माहौल लगातार विषाक्त हुआ है। तथाकथित यूट्यूब चैनल के स्टेट हेड बोधन भट्ट के साथ मिलकर भ्रष्टाचार में भी लिप्त है।स्थानीय लोग यह भी याद दिलाते हैं कि दुर्जन साहू पूर्व में ग्राम पंचायत जुंगेरा के सरपंच रह चुके हैं, और उस दौरान भी विकास कार्यों, सीसी रोड निर्माण, पंचायत फंड के उपयोग को लेकर कई बार सवाल उठे थे।

जनचर्चा है कि उन पर अनियमितताओं के आरोप लगे, जिनकी आज तक निष्पक्ष और सार्वजनिक जांच नहीं हो पाई। सवाल यह है कि जिन पर पहले से संदेह के बादल रहे हों, उन्हें इतनी संवेदनशील जिम्मेदारी कैसे सौंपी गई?ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी है कि कुछ कथित अवैध गतिविधियों—जैसे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कार्य, लकड़ी तस्करी और अन्य गैरकानूनी धंधों—की ओर प्रशासन ने आंखें मूंदे रखीं। भले ही ये बातें जांच का विषय हों, लेकिन इन पर चुप्पी खुद में संदेह को जन्म देती है।बालोद जिला अब तक आपसी सौहार्द और सामाजिक संतुलन के लिए जाना जाता रहा है। यहां कभी दंगा-फसाद जैसी स्थिति नहीं बनी, लेकिन यदि किसी सरकारी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बांटने वाली भाषा का प्रयोग करता है, तो यह आग से खेलने जैसा है। सवाल उठता है—क्या प्रशासन इस खतरे को समझ रहा है, या किसी बड़े बयान का इंतजार किया जा रहा है?मामले को और गंभीर बनाता है यह आरोप कि कुछ लोग खुद को यूट्यूब चैनल का स्टेट हेड बताकर धौंस दिखा रहे हैं और कथित रूप से पैसे की उगाही के साथ-साथ सार्वजनिक मंचों पर अनर्गल, अपमानजनक और अशोभनीय बयान दे रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है किकिसी विशेष समुदाय पर भी टीका टिप्पणी कर लोगों की छवि खराब करने की कोशिश कर रहे है।सबसे शर्मनाक आरोप यह है कि महिला पत्रकारों के साथ कथित तौर पर अभद्र भाषा का प्रयोग किया गया। यदि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के साथ ऐसा व्यवहार हो रहा है, तो यह केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा हमला है।आज बालोद पूछ रहा है।क्या धान खरीदी समितियां अब सेवा का केंद्र नहीं, बल्कि सत्ता के मद में चूर कुछ लोगों की जागीर बनती जा रही हैं?क्या प्रशासन केवल फाइलों में सक्रिय है, या ज़मीनी सच्चाई देखने का साहस भी रखता है?और सबसे बड़ा सवाल—यदि आज कार्रवाई नहीं हुई, तो कल सामाजिक सौहार्द की जिम्मेदारी कौन लेगा?अब वक्त है कि जिला प्रशासन, सहकारिता विभाग और राज्य शासन इन सभी आरोपों की निष्पक्ष, समयबद्ध और सार्वजनिक जांच कराए। दोषी चाहे कितना भी रसूखदार क्यों न हो, उसे कानून के कठघरे में लाना ही होगा। क्योंकि अगर व्यवस्था ने आज आंख मूंदी, तो कल यह ज़हर पूरे समाज को नुकसान पहुंचाएगा।बालोद को धान खरीदी केंद्र चाहिए, नफरत नहीं।किसानों को सम्मान चाहिए, भय नहीं।और समाज को शांति चाहिए, साजिश नहीं।
