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जरा सोचिए… अगर पत्रकार नहीं होंगे तो क्या होगा?

✍️ लाल टोपी राजू सोनी
प्रधान संपादक, पंचायत नियोजन, राजनांदगांव

आज “चौथे स्तंभ” का पुरस्कार दिवस है। वर्ष में दो बार ऐसा अवसर आता है जब पत्रकार अपने पाठकों से केवल खबर पढ़ने की नहीं, बल्कि एक छोटे से विज्ञापन की उम्मीद भी रखता है—ताकि उसके घर का चूल्हा जलता रहे, बच्चों की फीस भरती रहे और जिम्मेदारियों की होली फीकी न पड़े।
होली का त्योहार है। शहर रंगों में सराबोर है। नेता जी मंच पर गुलाल उड़ाते हुए भाषण दे रहे हैं, अधिकारी कैमरे की तरफ मुस्कुरा रहे हैं, और भीड़ नारे लगा रही है। लेकिन ज़रा एक क्षण ठहर कर सोचिए—अगर वहां पत्रकार ही न हो तो?
न कैमरा, न कलम, न सवाल…
तो क्या भीड़ वही रहेगी? क्या भाषण में वही जोश रहेगा? क्या वादों में वही सावधानी रहेगी?
सच तो यह है कि नेता भीड़ को नहीं, कवरेज को देखते हैं। पुलिस व्यवस्था को नहीं, कैमरे को देखती है। अधिकारी फाइल से पहले खबर की सुर्खी को पढ़ते हैं। क्योंकि उन्हें पता है—कल की हेडलाइन ही असली आईना है।
चौथा स्तंभ… बड़ा भारी शब्द है। पर इस स्तंभ की नींव में न वेतन है, न सुरक्षा। बस उम्मीद है—विज्ञापन की, पारितोषिक की, और समाज की संवेदना की।
छह महीने में त्योहार विशेषांक निकलता है। पत्रकार दिन-रात भागदौड़ करता है—प्रिंटिंग प्रेस, हाकर, लेखक, संपादक सबका हिसाब जोड़ता है। एक विज्ञापन से जो राशि मिलती है, वह भी चार चक्कर लगाने के बाद। और कभी-कभी पूरी भी नहीं।
फिर भी इल्ज़ाम तैयार रहता है—
“बिक गया…”
“फलां के पक्ष में लिख दिया…”
अरे जनाब, बिकता वही है जिसका दाम कोई दे। यहां तो कई बार पूरा दाम भी नहीं मिलता!
पत्रकार वही है जो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाता है। वही है जो सरकार बनते और गिरते देखता है। वही है जो चुनावी वादों की पुरानी फाइल निकाल कर नेताओं को याद दिलाता है—“जनाब, ये आपने ही कहा था।”
लेकिन जब वही पत्रकार अपनी जरूरत पर फोन करता है तो जवाब मिलता है—
“मीटिंग में हूं…”
“अभी व्यस्त हूं…”
“ऑफिस में बात कर लीजिए…”
या फिर फोन किसी और के हाथ में देकर ठहाके लगा दिए जाते हैं।
विडंबना देखिए—समाज बदलाव चाहता है, पर बदलाव लिखने वाले की स्याही सूखती रहे, इससे किसी को फर्क नहीं पड़ता।
जरा कल्पना कीजिए—अगर पत्रकार न हों तो?
घोटाले फाइलों में ही दम तोड़ देंगे।
वादे भाषणों में ही दफन हो जाएंगे।
और जनता केवल अफवाहों के सहारे जीएगी।
चौथा स्तंभ कोई मसीहा नहीं है। वह भी इसी समाज का हिस्सा है। फर्क बस इतना है कि वह खतरे उठाकर सच सामने लाता है। उसकी एक खबर कई लोगों के लिए असुविधाजनक हो सकती है, पर समाज के लिए जरूरी होती है।
होली है। रंगों का त्योहार।
आप गुलाल लगाइए, मिठाई बांटिए, हंसी-ठहाके लगाइए।
हम भी रंग में भीगेंगे—पर कलम का रंग नहीं छोड़ेंगे।
क्योंकि अगर कलम रुक गई, तो आईना धुंधला हो जाएगा।
इसलिए इस होली पर बस इतना याद रखिए—
विकास तभी संभव है जब हर स्तंभ अपनी जिम्मेदारी निभाए।
नेता वादा निभाए, अधिकारी कर्तव्य निभाए, जनता सजग रहे…
और पत्रकार सच लिखता रहे।
होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
रंगों के इस पर्व पर संवेदना का एक रंग चौथे स्तंभ के नाम भी लगाइए।
— लाल टोपी राजू सोनी
प्रधान संपादक, पंचायत नियोजन, राजनांदगांव

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